अरुणाचल प्रदेश की खूबसूरत सियांग घाटी इन दिनों गुस्से और विरोध की आग में जल रही है. जिस सियांग नदी ने सदियों से यहाँ की जनजातियों को जीवन और आश्रय दिया है, आज वही नदी एक बड़े विवाद का केंद्र बन चुकी है. विवाद का कारण है सरकार द्वारा प्रस्तावित 11,200 मेगावाट की 'सियांग अपर मल्टीपर्पस प्रोजेक्ट' (SUMP). एक तरफ सरकार इसे देश की सुरक्षा के लिए जरूरी बता रही है, तो दूसरी तरफ स्थानीय लोग अपनी जमीन, जंगल और वजूद को बचाने के लिए सड़कों पर उतर आए हैं. विरोध की मुख्य वजह क्या है? स्थानीय लोगों और आदिवासियों को डर है कि इतना बड़ा बांध बनने से उनके गांव पानी में डूब जाएंगे और उन्हें अपनी पुश्तैनी ज़मीन छोड़नी पड़ेगी. पहाड़ों का नाजुक संतुलन बिगड़ेगा, जिससे भूस्खलन और विनाशकारी बाढ़ का खतरा बढ़ेगा. इसके साथ ही उनकी सदियों पुरानी जीवनशैली, परंपराएं और संस्कृति हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगी. हालांकि मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने कहा है कि अभी बांध बनाने का कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है और सरकार सिर्फ शुरुआती जांच (सर्वे) कर रही है, लेकिन ग्रामीण इस बात को मानने को तैयार नहीं हैं. उनका कहना है कि शुरुआती सर्वे की मंज़ूरी देना ही तबाही की ओर पहला कदम है. चीन का एंगल, यह प्रोजेक्ट भारत के लिए क्यों ज़रूरी है? इस विवाद में सबसे बड़ा मोड़ चीन की वजह से आया है. तिब्बत में बहने वाली 'यारलुंग त्संगपो' नदी ही अरुणाचल में आकर 'सियांग' और आगे जाकर असम में 'ब्रह्मपुत्र' बनती है. चीन तिब्बत में मेडोग हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट बना रहा है, जो दुनिया का सबसे बड़ा 60,000 मेगावाट का बांध होगा. भारत को चीन के इस कदम से दो बड़े खतरे महसूस हो रहे हैं: -पानी रोकना (सूखा): चीन चाहे तो नदी का पानी रोककर भारत के पूर्वोत्तर रा
Source: ABP India
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